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दूर करें दुर्भाग्य

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दूर करें दुर्भाग्य  दुर्भाग्य अर्थात जीवन में आने वाला ऐसा समय जब मनुष्य के प्रयासों के बावजूद उसे सफलता नहीं मिलती। यह समय मन को हताश करता है, परंतु यही समय आत्ममंथन और आत्मबल को जागृत करने का अवसर भी होता है। दुर्भाग्य किसी भी व्यक्ति के जीवन का स्थायी सत्य नहीं होता। यह काल ग्रहों की स्थिति, कर्मों के फल और मनुष्य के दृष्टिकोण पर भी निर्भर करता है। प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है – "न हि दुर्भाग्यमस्ति पुरुषस्य प्रयासवत:" अर्थात कोई मनुष्य दुर्भाग्यशाली नहीं होता, यदि वह प्रयत्नशील हो। दुर्भाग्य के समय में कई लोग ईश्वर पर दोष देते हैं, जबकि यह समय साधना, संयम और धैर्य का होता है। यह हमारे जीवन का ऐसा पड़ाव है, जहाँ हम अपने अंदर छिपी हुई शक्ति को पहचान सकते हैं। समाधान: दुर्भाग्य को दूर करने के लिए कर्मशील बनना, सत्संग करना, ईश्वर का स्मरण करना और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से शांति उपाय अपनाना आवश्यक है।  जैसे – दान-पुण्य करना मंत्र जाप (जैसे "ॐ नमः शिवाय") ग्रह शांति यज्ञ गौ सेवा दुर्भाग्य कोई शाप नहीं, बल्कि जीवन की परीक्षा है। इसे धैर्य, श्रद्धा और साहस से...

गण मिलान

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🌟 गण मिलान क्या है? राक्षस गण का वास्तविक अर्थ 🌟 > राक्षस गण का मतलब ‘राक्षस’ नहीं होता। यह सिर्फ एक मानसिक और स्वभावगत श्रेणी है, जैसे कि देव गण और मनुष्य गण। 📜 कुल तीन प्रकार के गण होते हैं: 1. देव गण – विनम्र, शांत, धार्मिक प्रवृत्ति वाले। 2. मनुष्य गण – संतुलित, सामाजिक, व्यवहारिक। 3. राक्षस गण – तेज बुद्धि, साहसी, गूढ़ विषयों में रुचि रखने वाले। 🧠 राक्षस गण की विशेषताएं: तीव्र छठी इंद्री। परिस्थितियों को जल्दी भांपने की क्षमता। निडर, स्पष्टवादी और कभी-कभी कठोर बोलने वाले। जटिल और कठिन परिस्थितियों में भी डटकर सामना करने वाले। > 🌑 राक्षस गण के जातक अक्सर रिसर्च, मनोविज्ञान, गूढ़ विद्याओं या सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सफल होते हैं। 💑 गण मिलान और विवाह: विवाह कुंडली मिलान में गण मिलान (8 गुण) बहुत महत्वपूर्ण है। ✔️ उत्तम मेल: राक्षस गण + राक्षस गण: श्रेष्ठ, स्वभाव में समानता। ❌ असम मेल: राक्षस गण + देव गण: स्वभाव में टकराव, विवाह से बचें। राक्षस गण + मनुष्य गण: विशेष विचार-विमर्श आवश्यक। 📌 जरूरी संदेश: > अगर आपकी कुंडली में राक्षस गण है, तो चिंता न करें। य...

विवाह-मेलापक

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विवाह-मेलापक तथा मंगल, गुरु एवं सूर्य पर विचार। "धन्यो गृहस्थाश्रमः" विवाह गृहस्थाश्रमसे सम्बन्धित प्रथम संस्कार है। अतः विवाहसे सम्बन्धित अनेक बिन्दुओं - मेलापक, मंगली जन्मपत्री, गुरु एवं सूर्यसे सम्बन्धित दान आदि अनेकानेक स्थितियोंपर विचार करना अत्यन्त आवश्यक होता है। होडाचक्रके अनुसार नक्षत्रों एवं राशियोंका ज्ञान परम आवश्यक है। इसके अतिरिक्त विवाहसे सम्बन्धित वर्णगुण, वश्यगुण, तारागुण, योनिगुण, ग्रहमैत्रीगुण, गणगुण, राशिकूटगुण एवं नाड़ी- कूटगुणोंका विचार विशेष महत्त्व रखता है। साथ ही गुरु एवं सूर्यसे सम्बन्धित दान आदिपर भी संशयकी स्थितिका निवारण परम आवश्यक हो जाता है। मेलापकविचार – गृहस्थको अपनी कन्याके लिये वर निश्चित करते समय वरके कुल, शरीर, विद्या, अवस्था, धन, गुण एवं स्वास्थ्यदशापर अवश्य ही विचार करना चाहिये। बहुत ही समीप या बहुत दूर कन्याका विवाह नहीं करना चाहिये। वर-कन्याके नक्षत्र के अनुसार राशिनिर्धारण करते हुए गुणैक्यबोधकचक्रसे गुणोंकी जानकारी कर लेना चाहिये। सामान्यतया अठारह गुणोंसे अधिक गुण बननेपर विवाह शुभ एवं करणीय होता है। इसके साथ ही वर्णविचार क...

कब तक और कैसे उतरेगा कर्ज

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कब तक और कैसे उतरेगा कर्ज   कर्ज लेने के बाद कब तक उतरेगा और बिना परेशानी के उतरेगा या परेशानी से उतरेगा और कब तक??? यह सब कर्ज लेने वाले व्यक्ति की कुण्डली के ग्रहो की स्थिति पर। निर्भर करता है।कर्ज(loan) आज के समय ज्यादातर जातक/जातिका लेकर अपने जीवन की मूलभूत इच्छाएं पूरी करते है, जैसे मकान बनाने के लिए, शिक्षा के लिए, किसी आर्थिक समस्या से निकलने के लिए, व्यापार करने के लिए आदि।अब कई लोग या ज्यादातर लोग तो बैंक से ही कर्ज लेते हैं तो कुछ लोग बैंक से न लेकर ब्याज आदि पर भी बाहरी(प्राइवेट या अपने किसी संबंधित आदि) से कर्ज ले लेते है।। कर्ज तो ले लिया चाहे बैंक से लिया या कही ओर से, लेकिन कर्ज उतरेगा कब तक, और कोई परेशानी तो नही आएगी और कर्ज जिस कार्य के लिए लिया गया है उसमे सफलता मिलेगी या नही और क्या कर्ज आसानी से चुकता होगा त परेशानी आ गई तो बाद में कर्ज से कोई बड़ी परेशानी तो नही होगी और चुका दिया जाएगा या नही, अब आज इन्ही सब विषयों पर बात करते ...

वृश्चिक लग्न की कुंडली

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वृश्चिक लग्न की कुंडली में मंगल और शनि का ज्योतिषीय, दार्शनिक, और आध्यात्मिक विश्लेषण    वृश्चिक लग्न, मंगल के स्वामित्व में, एक रहस्यमयी, गहन, और परिवर्तनशील राशि है। यह सृष्टि के प्रलय और पुनर्जनन के चक्र का प्रतीक है। मंगल, अग्नि तत्त्व का स्वामी, पराक्रम, संकल्प, और हिंसक प्रवृत्तियों का कारक है, जबकि शनि, वायु तत्त्व का स्वामी, कर्म, संयम, और दीर्घकालिक परिणामों का प्रतीक है। इन दोनों ग्रहों का कुंडली के भावों में संन्यास और संग्राम का द्वंद्वात्मक संबंध जीवन के चतुरात्मक स्वरूप—धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष—को प्रकट करता है। वैदिक ज्योतिष में, प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, और दशम भाव केंद्र भाव कहलाते हैं, जो जीवन की कार्यप्रणाली के आधारभूत स्तंभ हैं। इन भावों के कारक ग्रह—सूर्य (प्रथम), चंद्र (चतुर्थ), शुक्र (सप्तम), और शनि (दशम)—आत्मा, मन, संबंध, और कर्म के प्रतीक हैं। इनके साथ मंगल और शनि का संन्यासी और योद्धा स्वरूप सृष्टि और प्रलय के चक्र को दर्शाता है। प्रथम भाव: आत्मा का प्राकट्य और मंगल-शनि का द्वंद्व प्रथम भाव आत्मा, स्वरूप, और संकल्प का केंद्र है, जिसका कारक सू...

मोबाईल के दुष्परिणाम से कैसे बचें

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मोबाईल के दुष्परिणाम से कैसे बचें  कुछ हद तक यह कहना सही है कि मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल व्यक्ति की **याददाश्त (memory)** को प्रभावित कर सकता है। लेकिन यह पूरी तरह से मोबाइल के इस्तेमाल पर निर्भर नहीं करता, बल्कि **उसके प्रयोग के तरीके** पर निर्भर करता है। ### मोबाइल के ज़्यादा उपयोग से कैसे याददाश्त पर असर पड़ सकता है? #### 1. **डिजिटल डिपेंडेंसी (Digital Dependency):** आजकल लोग हर छोटी चीज जैसे – फोन नंबर, रास्ता, जन्मदिन, टू-डू लिस्ट – मोबाइल में सेव कर लेते हैं। इससे **दिमाग की याद रखने की क्षमता कमज़ोर** हो सकती है क्योंकि हम खुद याद रखने की कोशिश नहीं करते। #### 2. **ध्यान भटकाव (Distraction):** मोबाइल पर बार-बार नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया, वीडियो आदि देखने से **concentration (एकाग्रता)** घटता है, जिससे नई चीजें सीखना और याद रखना मुश्किल हो जाता है। #### 3. **नींद की कमी:** अगर मोबाइल का उपयोग देर रात तक होता है तो नींद पूरी नहीं हो पाती। **नींद की कमी सीधे तौर पर याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है।** #### 4. **मल्टीटास्किंग की आदत:** मोबाइल से एक साथ ...

अमंगल

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अमंगल  मित्रों 🙏 अभी अहमदाबाद में हुए वायुयान दुर्घटना को हम भूल भी नहीं पाए थे और कल ( बीती हुई ) सुबह केदारनाथ में हेलीकॉप्टर के दुर्घटना ग्रस्त होने की दुखद खबर पुनः आ गई। एक के बाद एक दुर्घटना!😪 मित्रों दिनांक 7 जून से सिंह राशि में मंगल और केतु की अंगारक योग बनी हुई है। यह योग 28 जुलाई तक रहेगा। सिंह राशि स्वयं एक अग्नि तत्व की राशि है और उसपर भी मंगल जो कि एक अग्नि तत्व का ग्रह है, विराजमान है। और इतना ही नहीं केतु जो मोक्ष का कारक ग्रह है वह भी विराजमान है। मंगल और केतु दोनों परस्पर शत्रु हैं। मंगल हिंसा,अग्निकांड, युद्ध, रक्तपात ,वायुयान, रेल यान और भूमि पर जितने भी यान हैं उन सबका कारक ग्रह है।  स्थिति ये है कि मंगल आग लगायेगा और साथ का केतु उसे और अधिक भड़कायेगा और मृत्यु का तांडव खेलेगा। तो मन में एक प्रश्न उठता है ऐसे में करें तो क्या करे? घर में तो बैठ कर रह नहीं सकते। आफिस, स्कूल, ड्यूटी,काम, यात्रा पर भी तो जाना है। किसी को छोड़ भी नहीं सकते। तो आइए कुछ उपाय पर बात करते हैं कि जिनका पालन करते हुए हम सुरक्षित रह सकते हैं ----- 1--- ज्योतिष शास्त्र म...

वजन कैसे बढ़ाएं

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*वजन कैसे बढ़ाये* आज के समय में किसी भी व्यक्ति की फिट और तंदुरुस्त रहना कितना जरुरी है कई लोग मोटापे का शिकार है तो वही पर कुछ लोग दुबलेपन का शिकार है तो अगर आप पतले है और आपका वजन यानि वेट नहीं बढ़ रहा है और आप दुबलेपन से परेशान है खाना खाते है फिर भी शरीर में नहीं लगता तो आज हम आप कुछ घरेलु उपाय बताने वाले है कैसे आप घर पर ही अपने वजन को बढ़ा सकते है इसके साथ ही हम आपको ये भी बताएँगे की वजन बढ़ने के लिए आपको कोन सा योग और किस तरह का खाना खाना चाहिए ताकि आपको वेट बढे और फिट और तंदुरुस्त लगे  आज कल के भाग दोड़ की जिंदगी में लोगो के पास टाइम नहीं होता इसलिए लोगो का खान पान यानि की डाइट में भी ध्यान नहीं रहता अगर आप फिट और फाइन नहीं रहते तो ऐसे में आपको किसी भी तरह का बीमारी लग सकता है इसलिए तंदुरुस्त रहता बेहद जरुरी है अगर आप दुबले और पतले है तो ऐसे में आपको कई बीमारी का सामना करना पड़ सकता है कुछ लोग ऐसे होते है जो जितना भी खा ले लेकिन शरीर में नहीं लगता वो हमेशा पतले के पतले रहते है लेकिन आपने अपने दोस्तों को देखा होगा की पहले वो पतले थे लेकिन कुछ समझ बाद फिट और फाईन हो जात...

*जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या*

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*जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या*  *प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहनेवालो का जीवन निस्तेज हो जाता है ।* *प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल – त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।* *प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच –बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार ) घूँट-घूँट पिये।* *प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप ...

वैदिक ज्योतिष का इतिहास और उद्गम

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वैदिक ज्योतिष का इतिहास और उद्गम परिचय: वैदिक ज्योतिष, जिसे “ज्योतिष शास्त्र” भी कहा जाता है, भारतीय दर्शन और वेदों का अभिन्न अंग है। इसका मूल ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में पाया जाता है। यह शास्त्र ब्रह्मांडीय घटनाओं और मानव जीवन के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है। वैदिक ज्योतिष का उद्देश्य केवल भविष्यवाणी नहीं, बल्कि व्यक्ति को उसके कर्मों और जीवनपथ के प्रति जागरूक कराना है। 1. उद्गम: ▪ वेदों में उत्पत्ति: ज्योतिष शास्त्र का मूल वेदों में है, विशेषकर “वेदाङ्ग ज्योतिष” में, जो वेदों के छह अंगों में से एक है। इसकी दो शाखाएँ थीं: अर्जुनायन शाखा (ऋग्वेद के लिए) याजुष शाखा (यजुर्वेद के लिए) ▪ प्रमुख ऋषि: ज्योतिष शास्त्र की रचना में कई महान ऋषियों का योगदान रहा: महर्षि पाराशर – “बृहत् पाराशर होरा शास्त्र” के रचयिता वराहमिहिर – “बृहत्संहिता” और “बृहत्जातक” के लेखक आर्यभट – गणित और खगोलशास्त्र में योगदान भास्कराचार्य, लघुजातककार क्षणक, गर्गाचार्य इत्यादि 2. ऐतिहासिक विकास: ▪ वैदिक काल (~1500 ई.पू.): इस काल में सूर्य, चंद्र, नक्षत्रों की गति का अध्ययन वैदिक अनुष्ठानों हेत...

कैसे बढ़ेगी धन की आवक

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मूलांक 1 अंक ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 1, 10, 19 या 28 तारीख को हुआ है उनका मूलांक 1 होगा. इन लोगों को पर्स में कॉपर का सिक्का रखना चाहिए. ये सक्सेस, समृद्धि और सम्मान को बढ़ाता है. मूलांक 2 जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 2, 11, 20 या 29 तारीख को हुआ हो उनका मूलांक 2 होता है. इन लोगो को अपने पर्स में चांदी का सिक्का रखना चाहिए. ये शांति और स्थिरता को दर्शाता है. मूलांक 3 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 2, 11, 20 या 29 तारीख को हुआ हो उनका मूलांक 3 होता है. इन लोगों को अपने पर्स में हमेशा केसर रखना चाहिए. केसर गुरु ग्रह से जुड़ा होता है, ग्रोथ करता है. इसे आप पीले रंग के कागज में लपेटकर अपने पर्स में रखें. मूलांक 4 मूलांक 4 वाले जातक यदि आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं तो उन्हें अपने पर्स में जौ के दाने रखने चाहिए. अंक ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों का जन्म किसी भी माह की 4, 13, 22 या 31 तारीख को हुआ हो उनका मूलांक 4 होगा. मूलांक 5 जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 5, 14, 23 तारीख को हुआ है उनका मूलांक 5 होता ह...

सुन्दरकाण्ड

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सुन्दरकाण्ड  यह श्लोक भगवान श्रीराम की स्तुति में रचा गया है, जिसमें उनके दिव्य, शाश्वत, और करुणामय स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसका संस्कृत से हिन्दी भावार्थ नीचे प्रस्तुत है: --- श्लोक: शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥१॥ शब्दार्थ और भावार्थ: शान्तं – जो शांतस्वरूप है, शाश्वतम् – नित्य और अविनाशी, अप्रमेयम् – जिसे मापा नहीं जा सकता, अनघम् – पापरहित, निर्वाणशान्तिप्रदं – मोक्ष रूपी शांति प्रदान करने वाला, ब्रह्मा-शम्भु-फणीन्द्र-सेव्यम् – ब्रह्मा, शिव और शेषनाग द्वारा सेवित, अनिशं – निरंतर, वेदान्तवेद्यं – जिसे वेदान्त से जाना जा सकता है, विभुम् – सर्वव्यापी, रामाख्यं – जिनका नाम राम है, जगदीश्वरं – समस्त जगत के ईश्वर, सुरगुरुं – देवताओं के गुरु तुल्य, माया-मनुष्यं – माया से मनुष्य रूप में प्रकट, हरिं – भगवान विष्णु, वन्देऽहं – मैं वंदना करता हूँ, करुणाकरं – करुणा के सागर, रघुवरं – रघुवंश में श्रेष्ठ, भूपाल-चूडामणिम् – स...

स्त्री कुंडली के महत्वपूर्ण सूत्र

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स्त्री कुंडली के महत्वपूर्ण सूत्र  यदि स्त्री जातिका की जन्मकुंडली के अष्टम भाव में शनि, सूर्य, राहु, केतु, बृहस्पति अथवा मंगल इनमें से कोई भी ग्रह बैठा हो तो स्त्री सौभाग्यवती शुभ आचरण करने वाली सबको प्रिय व पति सेवा में निपुण होती है। * यदि छठे भाव में चंद्र बैठे हो तो उस स्त्री को पति सुख से वंचित होना पड़ता है। यदि शुक्र छठे भाव में स्थित हो तो वह स्त्री सब कुछ होते हुए भी अभाव में अपना जीवन व्यतीत करती है। यदि अष्टम भाव में बुध बैठे हो तो ऐसी स्त्री कलह प्रिय व परिवार में अशांति का कारण बनती है। यथा षष्ठे शनैश्चरकुजी रविराहुजीवाः, नारीं करोति शुभगाम पतिसेविनीम, चंद्रः करोति विधवामुशना दरिद्राम, वेश्यां शशांक तनय: कलह प्रियाम वा, लग्न सूत्र लग्न में अगर शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बुध, गुरु, चंद्र तो जातक को उसके शुभ चिंतकों और उसके आलोचकों या कहें उसका हित न चाहने वाले लोगों में अंतर करने में कठिनाई होगी यह पहचान नहीं पाएगा ! जबकि पापी ग्रह मंगल, शनि, सूर्य, राहू, केतु, लग्न में हों तो उसे साफ पता होगा कि कौन मेरा मित्र है और कौन मेरा शत्रु । ऐसे में खास बात क्या है कि लग...

अखंड विष्णु कार्याम

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अखण्ड विष्णु कार्यम् यह मंत्र एक अत्यंत दिव्य और गूढ़ अर्थ रखने वाला श्लोक है, जो भगवान नारायण (विष्णु) और उनके अवतार महर्षि व्यास को समर्पित है। आइए इस मंत्र की व्याख्या और इसके जप की विधि को विस्तार से जानते हैं। मंत्र: "अखण्ड विष्णु कार्यम् व्यासनेन चराचरम् तत्पदम दर्शितं येन तस्मै श्री लक्ष्मीयाय नमः नारायण नारायण नारायण" *शब्दार्थ और व्याख्या* 1. अखण्ड विष्णु कार्यम्: "अखण्ड" का अर्थ है "जिसमें कोई भंग न हो"। "विष्णु कार्यम्" यानी भगवान विष्णु का कार्य — जो सृष्टि की रक्षा और धर्म की स्थापना से जुड़ा है। भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत विष्णु का कार्य है, और यह कार्य अखण्ड रूप से चलता रहता है। 2. व्यासनेन चराचरम्: "व्यासनेन" का तात्पर्य है "वेदव्यास द्वारा"। "चराचरम्" यानी "सभी चल और अचल जीव"। 🔸 भावार्थ: वेदव्यास जी ने इस चराचर जगत की दिव्यता और विष्णु के कार्य को उद्घाटित किया। 3. तत्पदम दर्शितं येन: "तत् पदम्" यानी वह परम पद, जो मोक्ष का लक्ष्य है — भगवान का धाम। "दर्शितं येन...

कुरुक्षेत्र का युद्धस्थल (श्लोक-1)

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श्लोक-1 धृतराष्ट्र उवाच   धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव: ।   मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥     *अनुवाद:* धृतराष्ट्र ने कहा—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? *तात्पर्य:* भगवद्गीता एक बहुपठित आस्तिक विज्ञान है जो गीता-माहात्म्य में सार रूप में दिया हुआ है। इसमें यह उल्लेख है कि मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण के भक्त की सहायता से संवीक्षण करते हुए भगवद्गीता का अध्ययन करे और स्वार्थप्रेरित व्याख्याओं के बिना उसे समझने का प्रयास करे। अर्जुन ने जिस प्रकार से साक्षात् भगवान् कृष्ण से गीता सुनी और उसका उपदेश ग्रहण किया, इस प्रकार की स्पष्ट अनुभूति का उदाहरण भगवद्गीता में ही है। यदि उसी गुरु-परम्परा से, निजी स्वार्थ से प्रेरित हुए बिना, किसी को भगवद्गीता समझने का सौभाग्य प्राप्त हो तो वह समस्त वैदिक ज्ञान तथा विश्व के समस्त शास्त्रों के अध्ययन को पीछे छोड़ देता है। पाठक को भगवद्गीता में न केवल अन्य शास्त्रों की सारी बातें मिलेंगी अपितु ऐसी बातें भी मिलेंगी ...

लड्डू गोपाल की पूजन महिलाओं के लिए

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क्या मैं मासिक धर्म के दौरान भगवान कृष्ण की प्रार्थना कर सकती हूँ? हरे कृष्ण, हां, आप अपने पीरियड्स के दौरान भी पूजा-पाठ कर सकती हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है। हालांकि शास्त्रों के अनुसार बहुत सारे नियम हैं जिनका पालन करना ज़रूरी है, लेकिन गौड़ीय वैष्णव धर्म, जो उन्हीं का एक संप्रदाय है, महिलाओं के लिए बहुत ज़्यादा नियम नहीं बताता। आपको बस कुछ बातों का ध्यान रखना है। देवताओं के निकट न जाएं , महीने के समय में देवताओं की पूजा से बचें, फूल माला न बनाएं और देवता के कपड़े और अन्य सामान को न छुएं, बस दूर रहें और अपनी प्रार्थना अर्पित करें। भगवान के पवित्र नामों का जाप करें , जाप करने से व्यक्ति शुद्ध होता है, शुद्ध होने के बाद आप जाप नहीं करते, ऐसा नहीं है, इसलिए इस युग के लिए निर्धारित कृष्ण के महामंत्र का जाप करें जो है हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। इस समय अन्य मंत्रों का जाप न करें क्योंकि कुछ मंत्र जैसे गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय जप पूरी तरह से शुद्ध होने के बाद ही करने की आवश्यकता होती है। आप श्री कृष्ण के महामंत्र का जाप कर सकते ...