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स्याही के शब्द-2

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11-✍️ तलाश में उलझन रिश्तों की गहराई भूलकर, बंधन की मर्यादा तोड़कर, वो स्क्रीन पर सज रही है— मानो ज़िंदगी का सच अब कैमरे की झिलमिलाहट में ही छिपा हो। सोशल मीडिया के मंच पर फ़ूहड़ता का तमाशा बिक रहा है, जहाँ सादगी मज़ाक बन चुकी है, और उघाड़ापन ही "आधुनिकता" कहलाता है। कभी बहन, कभी बेटी, कभी माँ— इन रूपों की गरिमा कहाँ खो गई? किस तलाश में है वो? क्या कुछ पल की तालियों में उसकी आत्मा की प्यास बुझ जाएगी? शायद पहचान की भूख है, शायद अकेलेपन की चुभन है, या शायद दुनिया के शोर में अपने ही मौन को दबाने का प्रयास। पर क्या सचमुच यही तलाश है— कि रिश्तों की मर्यादाएँ गिरवी रखकर वह वर्चुअल तालियों का सौदा कर ले? या फिर यह भटकन है, जहाँ औरत अपनी असल ताक़त दिखावे की धूल में खो रही है। मर्यादा बोझ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की ढाल है। और जो उसे उतार फेंकती है, वह तलाश नहीं करती— बल्कि तलाश में खो रही है औरत। आर्यमौलिक ===🌸=== 12-✍️ इज्जत इज़्ज़त वो आईना है, जिसमें इंसान का असली चेहरा झलकता है, दरार पड़ जाए तो उम्रभर चमकता भी है, पर पहले जैसा नहीं लगता है। ये वो सुगंध है, जो बिन दिखे ह...

स्याही के शब्द-1

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1-✍️ बीमार मन की स्मृतियाँ बीमार मन की खिड़कियों पर स्मृतियों की धूल जमी रहती है, कभी कोई हंसी की आहट उस धूल में उँगलियाँ फेर जाती है, और कभी कोई रोष, शांत कोनों में फफूँदी बनकर उग आता है। स्मृतियाँ— वे अधूरी कविताएँ हैं जो लिखी तो गईं, पर कभी पूरी न हो सकीं। वे टूटे हुए सपनों की किरचें हैं जिन पर चलते-चलते मन के तलवे छिल जाते हैं। बीमार मन जानता है कि समय ही एक चिकित्सक है, पर समय की दवा धीरे-धीरे असर करती है— मानो गहरे कुएँ में डाली एक-एक बूंद पानी। कुछ स्मृतियाँ फफोलों जैसी हैं— छूने पर दर्द देती हैं, और कुछ, जैसे बुझ चुकी अग्नि की राख जो बस उँगलियों पर धूसर निशान छोड़ जाती है। बीमार मन फिर भी इन स्मृतियों को संजोए रहता है, मानो रोग ही उसकी पहचान हो, मानो दर्द ही उसके भीतर की अंतिम भाषा हो। आर्यमौलिक ===🌸=== 2-✍️ रुमानी यादों के पल धूप से छनकर आई कोई नर्म रोशनी, जैसे तुम्हारी हंसी का आख़िरी कतरा अब भी दिल में बस गया हो। पुरानी गलियों की हवा में, तेरे कदमों की सरसराहट आज भी सुनाई देती है। वो शामें—जहाँ वक्त रुकना चाहता था, और चाँद हमारी ख़ामोशी को तराशता था। कभी पत्तों प...